चल -चल, चल - चल चलती चल।।
पैर की धुन को सुनती चल।।
हाथ से थामो इसका हैण्डल।।
पाँव से अपने इसको दो बल।।
ज़ोर लगाके आगे बढ़ो तुम।।
ब्रेक लगाके रुक जाओ तुम।।
दो पहियों पे सर - सर चलदे।।
बेल बजे तो साफ हों रस्ते।।
एक, दो, तीन का भार उठाए।।
वक्त पे हमको ये पहुँचा।।
होती नहीं ऑयल की चिंता।।
भर दो हवा और चल दो रस्ता।।
पूछता है ये कासिम तुमसे।।
चलती हो दो पहियों पे कैसे।।
यह मुहम्मद कासिम द्वारा लिखि गयी प्रथम कविता है। इसे 7 फरवरी 2015 में लिखा गया था। इस कविता में हुई त्रूटीयों का संशोधन मेरे भाई मुहम्मद हुसैन ने किया था।

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